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mahabharat 9.39.35-38: कुरुवंशी राजन्! तत्पश्चात् पराक्रमी एवं तेजस्वी बलभद्रजी उस तीर्थस्थान पर आये जहाँ जगत् के पितामह भगवान ब्रह्मा ने जगत् की रचना की थी, जहाँ कठोर व्रत का पालन करने वाले महामुनि अष्टिषेण ने घोर तप करके ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था और जहाँ महामुनि सिन्धुद्वीपी, महातपस्वी देवापि तथा महातेजस्वी एवं महातपस्वी भगवान विश्वामित्र मुनि ने भी ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था ॥35-38॥   |   mahabharat अध्याय 9.39: औशनस एवं कपालमोचनतीर्थकी माहात्म्यकथा तथा रुषंगुके आश्रम पृथूदकतीर्थकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 39: औशनस एवं कपालमोचनतीर्थकी माहात्म्यकथा तथा रुषंगुके आश्रम पृथूदकतीर्थकी महिमा  »  श्लोक 35-38
 
 
श्लोक  9.39.35-38 
ससर्ज यत्र भगवाँल्लोकाँल्लोकपितामह:॥ ३५॥
यत्रार्ष्टिषेण: कौरव्य ब्राह्मण्यं संशितव्रत:।
तपसा महता राजन् प्राप्तवानृषिसत्तम:॥ ३६॥
सिन्धुद्वीपश्च राजर्षिर्देवापिश्च महातपा:।
ब्रह्मण्यं लब्धवान् यत्र विश्वामित्रस्तथा मुनि:॥ ३७॥
महातपस्वी भगवानुग्रतेजा महायशा:।
तत्राजगाम बलवान् बलभद्र: प्रतापवान्॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
कुरुवंशी राजन्! तत्पश्चात् पराक्रमी एवं तेजस्वी बलभद्रजी उस तीर्थस्थान पर आये जहाँ जगत् के पितामह भगवान ब्रह्मा ने जगत् की रचना की थी, जहाँ कठोर व्रत का पालन करने वाले महामुनि अष्टिषेण ने घोर तप करके ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था और जहाँ महामुनि सिन्धुद्वीपी, महातपस्वी देवापि तथा महातेजस्वी एवं महातपस्वी भगवान विश्वामित्र मुनि ने भी ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था ॥35-38॥
 
Kuruvanshi king! After that, the powerful and glorious Balbhadraji came to the place of pilgrimage where Lord Brahma, the great father of the world, had created the world, where the great sage Ashtishen, who followed a strict fast, had attained Brahminhood by doing great penance and where the great sage Sindhudweep, the great ascetic Devapi and the great, fiery and great ascetic Lord Vishwamitra Muni had also attained Brahminhood. 35-38॥
 
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्यान एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ३९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें

सारस्वतोपाख्यानविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३९॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)