श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 38: सप्तसारस्वततीर्थकी उत्पत्ति, महिमा और मंकणक मुनिका चरित्र  »  श्लोक 47-48
 
 
श्लोक  9.38.47-48 
एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठं महादेवेन धीमता॥ ४७॥
अङ्गुल्यग्रेण राजेन्द्र स्वङ्गुष्ठस्ताडितोऽभवत्।
ततो भस्म क्षताद् राजन् निर्गतं हिमसंनिभम्॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
राजेन्द्र! महामुनि मंकणक से ऐसा कहकर बुद्धिमान महादेव ने अपनी अँगुली के अग्रभाग से उनके अँगूठे पर घाव कर दिया। उस घाव से बर्फ के समान श्वेत राख गिरने लगी।
 
Rajendra! Having said this to the great sage Mankanaka, the wise Mahadeva made a wound on his thumb with the tip of his finger. From that wound, white ash like snow began to fall.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)