श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 35: बलदेवजीकी तीर्थयात्रा तथा प्रभास-क्षेत्रके प्रभावका वर्णनके प्रसंगमें चन्द्रमाके शापमोचनकी कथा  »  श्लोक 66-68h
 
 
श्लोक  9.35.66-68h 
ततो देवा: समागम्य सोममूचुर्महीपते॥ ६६॥
किमिदं भवतो रूपमीदृशं न प्रकाशते।
कारणं ब्रूहि न: सर्वं येनेदं ते महद् भयम्॥ ६७॥
श्रुत्वा तु वचनं त्वत्तो विधास्यामस्ततो वयम्।
 
 
अनुवाद
पृथ्वीनाथ! उस समय देवताओं ने चंद्रमा से मिलकर उनसे पूछा, 'आपका रूप ऐसा कैसे हो गया? इसमें चमक क्यों नहीं है? हमें वह पूरा कारण बताइए, जिससे आप इतने भयभीत हो गए। आपकी बात सुनकर हम इस समस्या का समाधान निकालेंगे।' 66-67 1/2।
 
Prithvinath! At that time the Gods met the Moon and asked him, 'How did your form become like this? Why does it not shine? Tell us the whole reason, because of which you got so scared. After listening to you, we will find a way to solve this problem.' 66-67 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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