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श्लोक 9.35.43  |
जनमेजय उवाच
कथं तु भगवन् सोमो यक्ष्मणा समगृह्यत।
कथं च तीर्थप्रवरे तस्मिंश्चन्द्रो न्यमज्जत॥ ४३॥ |
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| अनुवाद |
| जनमेजय ने पूछा - हे प्रभु ! चन्द्रमा को राजसी ज्वर कैसे हुआ और उन्होंने उस तीर्थ में किस प्रकार स्नान किया ? 43॥ |
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| Janamejaya asked – Lord! How did Chandrama suffer from royal fever and how did he take bath in that sacred place? 43॥ |
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