श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 35: बलदेवजीकी तीर्थयात्रा तथा प्रभास-क्षेत्रके प्रभावका वर्णनके प्रसंगमें चन्द्रमाके शापमोचनकी कथा  »  श्लोक 38-39
 
 
श्लोक  9.35.38-39 
जनमेजय उवाच
सारस्वतानां तीर्थानां गुणोत्पत्तिं वदस्व मे।
फलं च द्विपदां श्रेष्ठ कर्मनिर्वृत्तिमेव च॥ ३८॥
यथाक्रमेण भगवंस्तीर्थानामनुपूर्वश:।
ब्रह्मन् ब्रह्मविदां श्रेष्ठ परं कौतूहलं हि मे॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय बोले, "हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ और पुरुषों में श्रेष्ठ ब्राह्मण! अब आप मुझे सरस्वती नदी के तट पर स्थित तीर्थों के गुण, प्रभाव और उत्पत्ति का वर्णन करें। हे प्रभु! उन तीर्थों के दर्शन का फल तथा वहाँ सिद्धि प्राप्त करने वाले अनुष्ठान भी बताएँ। मैं यह सब सुनने के लिए बहुत उत्सुक हूँ।"
 
Janamejaya said, "O Brahmin, the best among the knowers of Brahman and the best among men! Now narrate to me the qualities, effects and origin of the holy places situated on the banks of Saraswati. O Lord! Also tell me the result of visiting those holy places and the rituals by which one attains success there. I am very eager to hear all this. 38-39.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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