श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 35: बलदेवजीकी तीर्थयात्रा तथा प्रभास-क्षेत्रके प्रभावका वर्णनके प्रसंगमें चन्द्रमाके शापमोचनकी कथा  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  9.35.34 
ततो महात्मा नियमे स्थितात्मा
पुण्येषु तीर्थेषु वसूनि राजन्।
ददौ द्विजेभ्य: क्रतुदक्षिणाश्च
यदुप्रवीरो हलभृत् प्रतीत:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
राजन! यदुवंश के वीर फरसाधारी सरदार महात्मा बलरामजी नियमपूर्वक रहते हुए तीर्थस्थानों में जाकर ब्राह्मणों को यज्ञ के लिए प्रसन्नतापूर्वक धन और दक्षिणा दिया करते थे।
 
Rajan! Mahatma Balram, the brave halberd-wielding leader of the Yadu clan, used to happily give money and dakshina for yagya to the brahmins on the pilgrimages to their holy places, while living according to rules. 34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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