श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 35: बलदेवजीकी तीर्थयात्रा तथा प्रभास-क्षेत्रके प्रभावका वर्णनके प्रसंगमें चन्द्रमाके शापमोचनकी कथा  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  9.35.33 
विपण्यापणपण्यानां नानाजनशतैर्वृत:।
नानाद्रुमलतोपेतो नानारत्नविभूषित:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
उस सड़क के किनारे सामान खरीदने-बेचने का एक बाज़ार था, जिसमें तरह-तरह के सैकड़ों लोग भरे हुए थे। वह बाज़ार तरह-तरह के वृक्षों और लताओं से सजा हुआ और अनगिनत रत्नों से अलंकृत लग रहा था।
 
There was a market for buying and selling goods running along that road, which was crowded with hundreds of people of various kinds. That market appeared decorated with various kinds of trees and creepers and adorned with numerous gems.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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