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mahabharat 9.24.65: उसके चलाए हुए, सुवर्ण-पंखों वाले, मारक बाण कवच में नहीं फँसते थे। वे कवच को भेदकर भीतर तक पहुँच जाते थे। वह मनुष्य, घोड़े अथवा विशाल हाथी पर भी दूसरा बाण नहीं छोड़ता था (वह एक ही बाण से उन्हें समाप्त कर देता था)॥ 65॥   |   mahabharat अध्याय 9.24: श्रीकृष्णके सम्मुख अर्जुनद्वारा दुर्योधनके दुराग्रहकी निन्दा और रथियोंकी सेनाका संहार   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 24: श्रीकृष्णके सम्मुख अर्जुनद्वारा दुर्योधनके दुराग्रहकी निन्दा और रथियोंकी सेनाका संहार  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  9.24.65 
तस्येषव: प्राणहरा: सुमुक्ता
नासज्जन् वै वर्मसु रुक्मपुङ्खा:।
न च द्वितीयं प्रमुमोच बाणं
नरे हये वा परमद्विपे वा॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
उसके चलाए हुए, सुवर्ण-पंखों वाले, मारक बाण कवच में नहीं फँसते थे। वे कवच को भेदकर भीतर तक पहुँच जाते थे। वह मनुष्य, घोड़े अथवा विशाल हाथी पर भी दूसरा बाण नहीं छोड़ता था (वह एक ही बाण से उन्हें समाप्त कर देता था)॥ 65॥
 
His well-shot, golden-feathered, lethal arrows did not get stuck on armour. They pierced through them and penetrated inside. He did not release a second arrow even on a man, horse or a huge elephant (he would finish them with a single arrow).॥ 65॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)