युधिष्ठिरं शतेनाजौ विव्याध भरतर्षभ।
भीमसेनं च सप्तत्या सहदेवं च पञ्चभि:॥ ९॥
नकुलं च चतु:षष्टॺा धृष्टद्युम्नं च पञ्चभि:।
सप्तभिर्द्रौपदेयांश्च त्रिभिर्विव्याध सात्यकिम्॥ १०॥
धनुश्चिच्छेद भल्लेन सहदेवस्य मारिष।
अनुवाद
भरतश्रेष्ठ! उन्होंने युद्धस्थल में युधिष्ठिर को सौ बाणों से, भीमसेन को सत्तर, सहदेव को पाँच, नकुल को चौंसठ, धृष्टद्युम्न को पाँच, द्रौपदीपुत्रों को सात तथा सात्यकि को तीन बाणों से घायल कर दिया। महाराज! उन्होंने डण्डे से सहदेव का धनुष भी काट डाला।
Bharatshrestha! In the battlefield, he wounded Yudhishthira with a hundred arrows, Bhimsen with seventy, Sahadev with five, Nakul with sixty-four, Dhrishtadyumna with five, Draupadi's sons with seven and Satyaki with three arrows. Sir! He also cut off Sahadev's bow by hitting a baton.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥