श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 13: मद्रराज शल्यका अद्भुत पराक्रम  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  9.13.41 
तत: कनकपुङ्खां तां शल्यक्षिप्तां वियद्‍गताम्।
शरवृष्टिमपश्याम शलभानामिवायतिम्॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् शल्य के छोड़े हुए सुवर्ण पंखवाले बाणों की वर्षा ने टिड्डियों के दल के समान आकाश को आच्छादित कर दिया, जिसे हमने अपनी आँखों से देखा ॥41॥
 
Thereafter a shower of golden-winged arrows shot by Shalya covered the sky like a swarm of locusts, which we saw with our own eyes. ॥ 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)