vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 9: शल्य पर्व
»
अध्याय 13: मद्रराज शल्यका अद्भुत पराक्रम
»
श्लोक 41
श्लोक
9.13.41
तत: कनकपुङ्खां तां शल्यक्षिप्तां वियद्गताम्।
शरवृष्टिमपश्याम शलभानामिवायतिम्॥ ४१॥
अनुवाद
तत्पश्चात् शल्य के छोड़े हुए सुवर्ण पंखवाले बाणों की वर्षा ने टिड्डियों के दल के समान आकाश को आच्छादित कर दिया, जिसे हमने अपनी आँखों से देखा ॥41॥
Thereafter a shower of golden-winged arrows shot by Shalya covered the sky like a swarm of locusts, which we saw with our own eyes. ॥ 41॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×