श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 94: शल्यके द्वारा रणभूमिका दिग्दर्शन, कौरव-सेनाका पलायन और श्रीकृष्ण तथा अर्जुनका शिविरकी ओर गमन  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  8.94.68 
यथानुरूपं प्रतिपूजितावुभौ
प्रशस्यमानौ स्वकृतैर्गुणौघै:।
ननन्दतुस्तौ ससुहृद्‍गणौ तदा
बलं नियम्येव सुरेशकेशवौ॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार बलासुर का दमन करके भगवान इन्द्र और भगवान विष्णु अपने मित्रों के साथ आनन्दित हुए थे, उसी प्रकार कर्ण को मारकर श्रीकृष्ण और अर्जुन भी अपने अर्जित गुणों के कारण यथायोग्य पूजित और सर्वत्र प्रशंसित होकर अपने शुभचिन्तकों और बन्धु-बान्धवों के साथ महान आनन्द का अनुभव करने लगे।
 
Just as Lord Indra and Lord Vishnu rejoiced with their friends after suppressing Balasura, in the same way Shri Krishna and Arjun, after killing Karna, got worshiped as they deserved and were widely praised by their acquired qualities and started experiencing great joy along with their well-wishers and relatives.
 
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि रणभूमिवर्णनं नाम चतुर्नवतितमोऽध्याय:॥ ९४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें रणभूमिका वर्णनविषयक चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९४॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)