इतीव संचिन्त्य सुरर्षिसंघा:
सम्प्रस्थिता यान्ति यथा निकेतनम्।
संचिन्तयित्वा जनता विसस्रु-
र्यथासुखं खं च महीतलं च॥ ३१॥
अनुवाद
इस युद्ध का विचार करते हुए देवता और ऋषियों का समूह वहाँ से निकलकर अपने-अपने स्थानों को चले गए। इसी बात का विचार करते हुए अन्य लोग भी प्रसन्नतापूर्वक अंतरिक्ष या पृथ्वी पर अपने-अपने धामों को चले गए ॥31॥
Thinking about this war, the group of gods and sages left the place and went to their respective places. While thinking about the same thing, other people also went happily to their respective abodes in space or on the earth. ॥ 31॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥