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श्लोक 8.91.7  |
यदा रजस्वलां कृष्णां दु:शासनवशे स्थिताम्।
सभायां प्राहस: कर्ण क्व ते धर्मस्तदा गत:॥ ७॥ |
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| अनुवाद |
| कर्ण! जब तूने भरी सभा में दु:शासन के वश में रजस्वला द्रौपदी का उपहास किया था, तब तेरा धर्म कहाँ चला गया था?॥ 7॥ |
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| Karna! Where did your Dharma go when you ridiculed Draupadi who was menstruating and under the control of Dushasan in the court of a crowd?॥ 7॥ |
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