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श्लोक 8.91.66  |
कर्णं तु शूरं पतितं पृथिव्यां
शराचितं शोणितदिग्धगात्रम्।
दृष्ट्वा शयानं भुवि मद्रराज-
श्छिन्नध्वजेनाथ ययौ रथेन॥ ६६॥ |
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| अनुवाद |
| वीर कर्ण को बाणों से बिंधे हुए तथा रक्त से लथपथ भूमि पर पड़ा देखकर मद्रराज शल्य कटे हुए ध्वज को लेकर रथ पर सवार होकर वहाँ से भाग गए। |
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| Seeing the valiant Karna lying on the ground, pierced by arrows and soaked in blood, Madra king Shalya fled from there on the chariot with the severed flag. 66. |
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