श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 90: अर्जुन और कर्णका घोर युद्ध, भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी सर्पमुख बाणसे रक्षा तथा कर्णका अपना पहिया पृथ्वीमें फँस जानेपर अर्जुनसे बाण न चलानेके लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  8.90.44 
तं चापि दग्ध्वा तपनीयचित्रं
किरीटमाकृष्य तदर्जुनस्य।
इयेष गन्तुं पुनरेव तूणं
दृष्टश्च कर्णेन ततोऽब्रवीत् तम्॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
अर्जुन का वह मुकुट सुवर्णमय और विचित्र शोभा वाला था। उसे खींचकर और अपनी विषैली अग्नि से जलाकर वह सर्प पुनः कर्ण के तरकश में प्रवेश करने ही वाला था कि कर्ण की दृष्टि उस पर पड़ गई। तब उसने कर्ण से कहा-॥44॥
 
That crown of Arjuna was of golden colour and had a strange beauty. After pulling it and burning it with its poisonous fire, that snake was about to enter Karna's quiver again when Karna's eyes fell on it. Then it said to Karna -॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)