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श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 88: अर्जुनद्वारा कौरव-सेनाका संहार, अश्वत्थामाका दुर्योधनसे संधिके लिये प्रस्ताव और दुर्योधनद्वारा उसकी अस्वीकृति  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  8.88.32 
न चापि कर्णं प्रसहेद् रणेऽर्जुनो
महागिरिं मेरुमिवोग्रमारुत:।
न चाश्वसिष्यन्ति पृथात्मजा मयि
प्रसह्य वैरं बहुशो विचिन्त्य॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
इसके अतिरिक्त जैसे प्रचण्ड वायु भी महाबली मेरुका पर्वत का सामना नहीं कर सकती, वैसे ही अर्जुन भी इस युद्धभूमि में कर्ण के वेग का सामना नहीं कर सकते। हमने जो बार-बार हठपूर्वक शत्रुता दिखाई है, उसे सोचकर कुन्तीपुत्र मुझ पर विश्वास भी नहीं करेंगे॥ 32॥
 
‘Apart from this, just as a fierce wind cannot withstand the mighty mountain Meruka, similarly Arjuna cannot withstand the speed of Karna on this battlefield. Thinking of the enmity we have repeatedly and stubbornly shown, Kunti's sons will not even trust me.॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)