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mahabharat 8.88.30: जब उसका मित्र अश्वत्थामा इस प्रकार बोला, तब दुर्योधन ने विचार करके गहरी साँस ली और दुःखी होकर इस प्रकार कहा - 'मित्र! तुम जो कुछ कह रहे हो, वह ठीक है; परन्तु मुझे भी इस विषय में कुछ कहना है, अतः मेरी भी बात सुनो॥ 30॥   |   mahabharat अध्याय 8.88: अर्जुनद्वारा कौरव-सेनाका संहार, अश्वत्थामाका दुर्योधनसे संधिके लिये प्रस्ताव और दुर्योधनद्वारा उसकी अस्वीकृति   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 88: अर्जुनद्वारा कौरव-सेनाका संहार, अश्वत्थामाका दुर्योधनसे संधिके लिये प्रस्ताव और दुर्योधनद्वारा उसकी अस्वीकृति  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  8.88.30 
स एवमुक्त: सुहृदा वचो हितं
विचिन्त्य नि:श्वस्य च दुर्मनाब्रवीत्।
यथा भवानाह सखे तथैव त-
न्ममापि विज्ञापयतो वच: शृणु॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
जब उसका मित्र अश्वत्थामा इस प्रकार बोला, तब दुर्योधन ने विचार करके गहरी साँस ली और दुःखी होकर इस प्रकार कहा - 'मित्र! तुम जो कुछ कह रहे हो, वह ठीक है; परन्तु मुझे भी इस विषय में कुछ कहना है, अतः मेरी भी बात सुनो॥ 30॥
 
When his friend Ashvatthama spoke in this manner, Duryodhan, after pondering over it, took a deep breath and being saddened, said thus - 'Friend! Whatever you are saying is all right; but I too have something to say in this matter, so listen to me also.॥ 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)