श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 87: कर्ण और अर्जुनका द्वैरथयुद्धमें समागम, उनकी जय-पराजयके सम्बन्धमें सब प्राणियोंका संशय, ब्रह्मा और महादेवजीद्वारा अर्जुनकी विजय-घोषणा तथा कर्णकी शल्यसे और अर्जुनकी श्रीकृष्णसे वार्ता  »  श्लोक 95-96
 
 
श्लोक  8.87.95-96 
युद्धाभिलाषुको भूत्वा ध्वजो गाण्डीवधन्वन:।
कर्णध्वजमुपातिष्ठत् स्वस्थानाद् वेगवान् कपि:॥ ९५॥
उत्पपात महावेग: कक्ष्यामभ्याहनत्तदा।
नखैश्च दशनैश्चैव गरुड: पन्नगं यथा॥ ९६॥
 
 
अनुवाद
अर्जुन का ध्वज, गाण्डीव धारण किये हुए, मानो युद्ध के लिए आतुर होकर कर्ण के ध्वज पर प्रहार करने लगा। उस समय अर्जुन के ध्वज का वह अत्यन्त वेगवान वानर अपने स्थान से उछल पड़ा और कर्ण के ध्वज की श्रृंखला पर प्रहार करने लगा, मानो गरुड़ अपने पंजों और चोंच से सर्प पर प्रहार कर रहे हों।
 
Arjuna's flag, wielding Gandiva, as if eager for battle, began to attack Karna's flag. The very swift monkey of Arjuna's flag at that time leapt from its place and began striking the chain of Karna's flag, as if Garuda were striking a serpent with its claws and beak.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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