श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 87: कर्ण और अर्जुनका द्वैरथयुद्धमें समागम, उनकी जय-पराजयके सम्बन्धमें सब प्राणियोंका संशय, ब्रह्मा और महादेवजीद्वारा अर्जुनकी विजय-घोषणा तथा कर्णकी शल्यसे और अर्जुनकी श्रीकृष्णसे वार्ता  »  श्लोक 94
 
 
श्लोक  8.87.94 
कपिश्रेष्ठस्तु पार्थस्य व्यादितास्य इवान्तक:।
दंष्ट्राभिर्भीषयन् भाभिर्दुर्निरीक्ष्यो रविर्यथा॥ ९४॥
 
 
अनुवाद
कुन्तीपुत्र अर्जुन के रथ पर यमराज के समान एक महान वानर बैठा था, जिसका मुख बाईं ओर था। वह अपने दाँतों से सबको भयभीत कर रहा था। वह अपने तेज के कारण सूर्य के समान दिख रहा था। उसकी ओर देखना कठिन था॥ 94॥
 
On the chariot of Arjuna, the son of Kunti, was sitting a great monkey like Yamaraja with his face turned left. He used to frighten everyone with his teeth. He looked like the Sun due to his radiance. It was difficult to look at him.॥ 94॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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