श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 87: कर्ण और अर्जुनका द्वैरथयुद्धमें समागम, उनकी जय-पराजयके सम्बन्धमें सब प्राणियोंका संशय, ब्रह्मा और महादेवजीद्वारा अर्जुनकी विजय-घोषणा तथा कर्णकी शल्यसे और अर्जुनकी श्रीकृष्णसे वार्ता  »  श्लोक 41-45h
 
 
श्लोक  8.87.41-45h 
मुनयश्चारणा: सिद्धा वैनतेया वयांसि च॥ ४१॥
रत्नानि निधय: सर्वे वेदाश्चाख्यानपञ्चमा:।
सोपवेदोपनिषद: सरहस्या: ससंग्रहा:॥ ४२॥
वासुकिश्चित्रसेनश्च तक्षको मणिकस्तथा।
सर्पाश्चैव तथा सर्वे काद्रवेयाश्च सान्वया:॥ ४३॥
विषवन्तो महाराज नागाश्चार्जुनतोऽभवन्।
ऐरावता: सौरभेया वैशालेयाश्च भोगिन:॥ ४४॥
एतेऽभवन्नर्जुनत: क्षुद्रसर्पाश्च कर्णत:।
 
 
अनुवाद
महाराज! ऋषिगण, भाट, सिद्धगण, गरुड़, पक्षीगण, रत्न, निधियाँ, उपवेद, उपनिषद्, रहस्य, संग्रह और इतिहास-पुराण सहित सम्पूर्ण वेद, वासुकि, चित्रसेन, तक्षक, माणिक, सम्पूर्ण नागगण, कद्रू की सन्तानें तथा उनके वंशज, विषधर सर्प, ऐरावत, सौरभ्य और वैशलेय नाग- ये सभी अर्जुन के पक्ष में हो गए। छोटे-छोटे सर्प कर्ण का साथ देने लगे। 41—44 1/2॥
 
Maharaj! The sages, the bards, the Siddhas, Garuda, the birds, the gems, the treasures, the Upavedas, the Upanishads, the secrets, the collections and the entire Vedas including the Itihasa-Puranas, Vasuki, Chitrasena, Takshak, Manik, the entire serpent group, the children of Kadru along with their descendants, the poisonous snakes, Airavat, Saurabheya and the Vaishaleya serpents – all of them became in favor of Arjun. Small snakes started supporting Karna. 41—44 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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