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श्लोक 8.87.112-113  |
द्रष्टासि ध्रुवमद्यैव विधवा: कर्णयोषित:।
न हि मे शाम्यते मन्युर्यदनेन पुरा कृतम्॥ ११२॥
कृष्णां सभागतां दृष्ट्वा मूढेनादीर्घदर्शिना।
अस्मांस्तथावहसता क्षिपता च पुन:पुन:॥ ११३॥ |
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| अनुवाद |
| आज तुम निश्चय ही कर्ण की पत्नियों को विधवा होते देखोगे। इस अदूरदर्शी मूर्ख ने द्रौपदी को राजसभा में आते देखकर बार-बार उसका और हमारा उपहास किया तथा हम सबको दोषी ठहराया। ऐसा करते हुए कर्ण ने पूर्वकाल में जो दुष्कर्म किए हैं, उन्हें स्मरण करके मेरा क्रोध शांत नहीं होता॥112-113॥ |
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| You will certainly see Karna's wives widowed today. This short-sighted fool, seeing Draupadi coming to the court, repeatedly made fun of her and us and blamed all of us. Remembering the misdeeds that Karna has committed in the past while doing so, my anger does not subside.॥ 112-113॥ |
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