| श्री महाभारत » पर्व 8: कर्ण पर्व » अध्याय 87: कर्ण और अर्जुनका द्वैरथयुद्धमें समागम, उनकी जय-पराजयके सम्बन्धमें सब प्राणियोंका संशय, ब्रह्मा और महादेवजीद्वारा अर्जुनकी विजय-घोषणा तथा कर्णकी शल्यसे और अर्जुनकी श्रीकृष्णसे वार्ता » श्लोक 108-109 |
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| | | | श्लोक 8.87.108-109  | मम तावदपर्याप्तौ कर्णशल्यौ जनार्दन।
सपताकध्वजं कर्णं सशल्यरथवाजिनम्॥ १०८॥
सच्छत्रकवचं चैव सशक्तिशरकार्मुकम्।
द्रष्टास्यद्य रणे कृष्ण शरैश्छिन्नमनेकधा॥ १०९॥ | | | | | | अनुवाद | | जनार्दन! ये कर्ण और शल्य मेरे लिए पर्याप्त नहीं हैं। श्रीकृष्ण! आज आप युद्धभूमि में देखेंगे, मैं अपने बाणों से कर्ण को उसके कवच, छत्र, भाला, धनुष, बाण, ध्वजा, पताका, रथ, अश्व और राजा शल्य सहित टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा।' | | | | ‘Janardan! These Karna and Shalya are not enough for me. Shri Krishna! Today you will see in the battlefield, I will break Karna into pieces with my arrows along with his armour, umbrella, spear, bow, arrow, flag, banner, chariot, horse and King Shalya. | | ✨ ai-generated | | |
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