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श्लोक 8.84.42  |
इत्येवमुक्त: सहसा किरीटी
भ्रात्रा समक्षं नकुलेन संख्ये।
कपिध्वजं केशवसंगृहीतं
प्रैषीदुदग्रो वृषसेनाय वाहम्॥ ४२॥ |
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| अनुवाद |
| युद्ध में आगे आये अपने भाई नकुल की यह बात सुनकर किरीटधारी अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण के वश में किये हुए वानर ध्वज वाले रथ को बड़ी तेजी से वृषसेन की ओर दौड़ाया। |
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| Upon hearing his brother Nakula say this, who had come forward in the battle, the crown-wearing Arjuna suddenly drove the monkey-flagged chariot, which was under the control of Lord Krishna, towards Vrishasena with great speed. |
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इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि वृषसेनयुद्धे नकुलपराजये चतुरशीतितमोऽध्याय:॥ ८४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें वृषसेनका युद्ध और नकुलकी पराजयविषयक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८४॥
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