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श्लोक 8.78.35-36h  |
तत्राक्रन्दो महानासीत् पञ्चालानां महारणे॥ ३५॥
वध्यतां सायकैस्तीक्ष्णै: कर्णचापवरच्युतै:। |
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| अनुवाद |
| कर्ण के धनुष से छूटे हुए तीखे बाणों से मारे गये पांचालों का महान् हाहाकार उस महायुद्ध में गूँजने लगा। |
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| The great cries of the Panchalas who were killed by the sharp arrows shot from Karna's bow started echoing in that great war. |
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