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श्लोक 8.77.64-65  |
अन्यद् गृह्य धनु: सज्यं त्वरमाणो महाबल:॥ ६४॥
मुहूर्तादिव राजेन्द्र च्छादयामास सायकै:।
सौबलस्य बलं संख्ये त्यक्त्वाऽऽत्मानं महाबल:॥ ६५॥ |
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| अनुवाद |
| राजन! महाबली भीमसेन ने शीघ्रतापूर्वक दूसरा धनुष लेकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाई और युद्ध में प्राणों की मोहमाया त्यागकर उसी समय सुबलपुत्र की सेना को बाणों से आच्छादित कर दिया। |
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| King! The mighty Bhima hastily took another bow and strung it and giving up the attachment to his life in battle, at the same time covered the army of Subala's son with arrows. 64-65. |
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