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श्लोक 8.76.31  |
विभ्राजते चातिमात्रं किरीटं
विचित्रमेतच्च धनंजयस्य।
दिवाकराभो मणिरेष दिव्यो
विभ्राजते चैव किरीटसंस्थ:॥ ३१॥ |
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| अनुवाद |
| धनंजय का यह अद्वितीय मुकुट अत्यंत उज्ज्वल है। इस मुकुट में जड़ा दिव्य मणि सूर्य के समान चमकता है ॥31॥ |
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| This unique crown of Dhananjaya is extremely bright. The divine gem embedded in this crown shines like the Sun. ॥ 31॥ |
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