श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 76: भीमसेनका अपने सारथि विशोकसे संवाद  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  8.76.10-11 
ततो धीमान् सारथिमब्रवीद् बली
स भीमसेन: पुनरेव हृष्ट:॥ १०॥
सूताभिजानीहि स्वकान् परान् वा
रथान् ध्वजांश्चापतत: समेतान्।
युद्धॺन् ह्यहं नाभिजानामि किंचि-
न्मा सैन्यं स्वं छादयिष्ये पृषत्कै:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् बलवान एवं बुद्धिमान भीमसेन ने प्रसन्न होकर पुनः अपने सारथि से इस प्रकार कहा, 'सुत! इन अनेक रथों और ध्वजों को पहचानो, जो एक साथ आ रहे हैं। ये मेरे पक्ष के हैं या शत्रु के? क्योंकि युद्ध करते समय मैं नहीं जानता कि कौन मेरा है और कौन मेरा नहीं; कहीं ऐसा न हो कि मैं अपनी ही सेना को बाणों से ढक दूँ।'
 
Thereafter, the powerful and intelligent Bhimasena, overjoyed, again spoke to his charioteer thus, 'Sut! Identify these many chariots and flags which are coming together. Are they from my side or the enemy's? Because while fighting I do not know who is mine and who is not mine; it may happen that I cover my own army with arrows.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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