श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 71: अर्जुनसे भगवान् श्रीकृष्णका उपदेश, अर्जुन और युधिष्ठिरका प्रसन्नतापूर्वक मिलन एवं अर्जुनद्वारा कर्णवधकी प्रतिज्ञा, युधिष्ठिरका आशीर्वाद  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  8.71.5 
हत्वा तु नृपतिं पार्थ अकरिष्य: किमुत्तरम्।
एवं हि दुर्विदो धर्मो मन्दप्रज्ञैर्विशेषत:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
कुन्तीनन्दन! राजा को मारकर तुम क्या करते? इस प्रकार धर्म का स्वरूप सबके लिए समझ से परे है। विशेषतः जिनकी बुद्धि मंद है, उनके लिए उसके सूक्ष्म स्वरूप को समझना अत्यन्त कठिन है।॥5॥
 
‘Kuntinandan! What would you have done after killing the king? In this way the nature of Dharma is incomprehensible to everyone. Especially for those who have a dull intellect, it is very difficult to understand its subtle nature.॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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