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श्लोक 8.71.40  |
प्रयाहि वृद्धं च दिशन्तु देवता
यथाहमिच्छामि तवास्तु तत् तथा।
प्रयाहि शीघ्रं जहि कर्णमाहवे
पुरंदरो वृत्रमिवात्मवृद्धये॥ ४०॥ |
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| अनुवाद |
| ‘जाओ, देवता तुम्हें कल्याण प्रदान करें। मैं जो कुछ चाहता हूँ, वह तुम्हें मिले। जाओ और युद्धभूमि में शीघ्र ही कर्ण का वध करो, जैसे देवराज इन्द्र ने अपनी समृद्धि बढ़ाने के लिए वृत्रासुर का वध किया था।’॥40॥ |
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| ‘Go, may the gods grant you prosperity. May you get everything I wish for you. Go ahead and kill Karna quickly on the battlefield, just like Devaraj Indra killed Vritrasura to increase his own prosperity.’॥ 40॥ |
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इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि अर्जुनप्रतिज्ञायामेकसप्ततितमोऽध्याय:॥ ७१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें अर्जुनका प्रतिज्ञाविषयक एक सौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७१॥
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