श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 70: भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको प्रतिज्ञा-भंग, भ्रातृवध तथा आत्मघातसे बचाना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर संतुष्ट करना  »  श्लोक 24-25h
 
 
श्लोक  8.70.24-25h 
इत्येवमुक्त: पुरुषोत्तमेन
सुदु:खित: केशवमर्जुनोऽब्रवीत् ॥ २४॥
अहं हनिष्ये स्वशरीरमेव
प्रसह्य येनाहितमाचरं वै।
 
 
अनुवाद
भगवान् श्रीकृष्ण के इस प्रश्न पूछने पर अर्जुन अत्यन्त दुःखी हुए और बोले, 'हे प्रभु! अब मैं अपने उस शरीर को नष्ट कर दूँगा, जिसके द्वारा मैंने हठपूर्वक अपने भाई का अपमान करने जैसा अहितकर कार्य किया है।' ॥24 1/2॥
 
Arjuna became very sad when the Supreme Personality of Godhead Sri Krishna asked him this question and said to him, 'O Lord! I will now destroy that very body of mine, by which I have obstinately done the harmful act of insulting my brother.' ॥ 24 1/2 ॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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