श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 65: भीमसेनको युद्धका भार सौंपकर श्रीकृष्ण और अर्जुनका युधिष्ठिरके पास जाना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  8.65.23 
तावभ्यनन्दत् कौन्तेय: साम्ना परमवल्गुना।
स्मितपूर्वममित्रघ्नं पूजयन् भरतर्षभ॥ २३॥
 
 
अनुवाद
भरतश्रेष्ठ! ऐसा विचार करके कुन्तीकुमार युधिष्ठिर ने हँसकर शत्रु श्रीकृष्ण और अर्जुन की प्रशंसा की तथा अत्यन्त मधुर एवं सान्त्वनापूर्ण वचनों से उन दोनों का अभिवादन किया॥23॥
 
Bharatshrestha! Thinking this, Kuntikumar Yudhishthir smiled and praised the enemies Shri Krishna and Arjun and greeted both of them with very sweet and consoling words. 23॥
 
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि युधिष्ठिरं प्रति श्रीकृष्णार्जुनागमे पञ्चषष्टितमोऽध्याय:॥ ६५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें युधिष्ठिरके पास श्रीकृष्ण और अर्जुनका आगमनविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६५॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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