श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 65: भीमसेनको युद्धका भार सौंपकर श्रीकृष्ण और अर्जुनका युधिष्ठिरके पास जाना  »  श्लोक 11-12
 
 
श्लोक  8.65.11-12 
संजय उवाच
तद् भीमसेनस्य वचो निशम्य
सुदुष्करं भ्रातुरमित्रमध्ये।
संशप्तकानीकमसह्यमेक:
सुदुष्करं धारयामीति पार्थ:॥ ११॥
उवाच नारायणमप्रमेयं
कपिध्वज: सत्यपराक्रमस्य।
श्रुत्वा वचो भ्रातुरदीनसत्त्व-
स्तदाहवे सत्यवचो महात्मा।
द्रष्टुं कुरुश्रेष्ठमभिप्रयास्यन्
प्रोवाच वृष्णिप्रवरं तदानीम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
संजय कहते हैं- राजन! शत्रुओं के समूह में अपने भाई भीमसेन से यह अत्यन्त कठिन वचन सुनकर कि ‘मैं अकेला ही उस असह्य संशप्तक सेना का सामना करूँगा’ उदार हृदय महात्मा कपिध्वज अर्जुन ने सत्यनिष्ठ वीर भाई भीमसेन का वह सत्य वचन सुनकर अच्युत वृष्णिवंशावतार नारायणावतार भगवान श्रीकृष्ण से कहा और उस समय कौरवों में श्रेष्ठ युधिष्ठिर के दर्शन की इच्छा से जाने के लिए तैयार होकर इस प्रकार कहा- ॥11-12॥
 
Sanjay says- Rajan! Hearing this very difficult word from his brother Bhimsen in the group of enemies that 'I alone will face the unbearable Samshaptak army', the generous-hearted Mahatma Kapidhwaj Arjun, after listening to that true word of the truthful brave brother Bhima, told it to Lord Shri Krishna, the infallible Vrishnivanshavatans Narayanavtar and at that time, getting ready to go with the desire to see Yudhishthira, the best of the Kurus, said thus - ॥ 11-12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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