श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 58: अर्जुनका श्रीकृष्णसे युधिष्ठिरके पास चलनेका आग्रह तथा श्रीकृष्णका उन्हें युद्धभूमि दिखाते और वहाँका समाचार बताते हुए रथको आगे बढ़ाना  »  श्लोक 27-28h
 
 
श्लोक  8.58.27-28h 
निरस्तजिह्वान् मातङ्गान् शयानान् पर्वतोपमान्॥ २७॥
वैजयन्तीर्विचित्राश्च हतांश्च गजवाजिन:।
 
 
अनुवाद
असंख्य पर्वताकार हाथी जीभ निकाले हुए पृथ्वी पर सदा के लिए सो गए हैं। विचित्र वैजयंती ध्वजाएँ टूटी हुई पड़ी हैं और हाथी-घोड़े मारे गए हैं।॥27 1/2॥
 
‘Innumerable mountain-sized elephants with their tongues sticking out have fallen asleep on the earth forever. The strange Vaijayanti flags are lying broken and the elephants and horses have been killed.॥ 27 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)