श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 58: अर्जुनका श्रीकृष्णसे युधिष्ठिरके पास चलनेका आग्रह तथा श्रीकृष्णका उन्हें युद्धभूमि दिखाते और वहाँका समाचार बताते हुए रथको आगे बढ़ाना  »  श्लोक 22-24h
 
 
श्लोक  8.58.22-24h 
साङ्गुलित्रैर्भुजाग्रैश्च विप्रविद्धैरलंकृतै:॥ २२॥
हस्तिहस्तोपमैश्छिन्नैरूरुभिश्च तरस्विनाम्।
बद्धचूडामणिवरै: शिरोभिश्च सकुण्डलै:॥ २३॥
पतितैर्ऋषभाक्षाणां विराजति वसुंधरा।
 
 
अनुवाद
‘वृषभ के समान विशाल नेत्रों वाले वीर योद्धाओं के अलंकृत हाथ दस्तानों सहित कटकर गिर पड़े हैं। हाथियों की सूँड़ के समान मोटी जाँघें चूर-चूर हो गई हैं और कुण्डलों से विभूषित तथा उत्तम चूड़ामणि से विभूषित सिर भी धड़ से अलग पड़े हैं। ये सब युद्धभूमि की अनुपम शोभा बढ़ा रहे हैं।॥ 22-23 1/2॥
 
‘The ornamented hands of the valiant warriors with large eyes like those of a bull, along with their gloves, have been cut off and fallen. The thighs, as thick as the trunks of elephants, have been shattered and the heads adorned with earrings and adorned with the best Chudamani have also been lying separated from the torso. All these are adding to the unique beauty of the battlefield.॥ 22-23 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)