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श्लोक 8.56.147  |
युधिष्ठिरोऽपि संग्रामे प्रहारैर्गाढवेदन:।
क्रोशमात्रमपक्रम्य तस्थौ भरतसत्तम॥ १४७॥ |
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| अनुवाद |
| हे भरतश्रेष्ठ! युद्ध में युधिष्ठिर पर इतने प्रहार हुए कि वे अत्यन्त पीड़ा में पड़ गए। वे युद्धभूमि से एक कोस दूर खड़े थे। |
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| O best of the Bharatas! Yudhishthira was attacked so many times in the war that he was in great pain. He was standing one kos away from the battlefield. |
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इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे षट्पञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५६॥
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