श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 56: नकुल-सहदेवके साथ दुर्योधनका युद्ध, धृष्टद्युम्नसे दुर्योधनकी पराजय, कर्णद्वारा पांचाल-सेनासहित योद्धाओंका संहार, भीमसेनद्वारा कौरव योद्धाओंका सेनासहित विनाश, अर्जुनद्वारा संशप्तकोंका वध तथा अश्वत्थामाका अर्जुनके साथ घोर युद्ध करके पराजित होना  »  श्लोक 139-140
 
 
श्लोक  8.56.139-140 
एवमुक्तस्तु कृष्णेन गृह्य भल्लांश्चतुर्दश।
त्वरमाणस्त्वराकाले द्रौणेर्धनुरथाच्छिनत्॥ १३९॥
ध्वजं छत्रं पताकाश्च खड्गं शक्तिं गदां तथा।
जत्रुदेशे च सुभृशं वत्सदन्तैरताडयत्॥ १४०॥
 
 
अनुवाद
भगवान कृष्ण की यह बात सुनकर अर्जुन ने अपनी फुर्ती दिखाते हुए चौदह बाण हाथ में लेकर अश्वत्थामा का धनुष काट डाला। साथ ही उसकी ध्वजा, छत्र, पताका, तलवार, भाला और गदा भी टुकड़े-टुकड़े कर दीं। इसके बाद 'वत्सदंत' नामक बाणों से अश्वत्थामा के हंसली पर गहरा घाव कर दिया।
 
On hearing Lord Krishna say this, Arjuna showed his agility by taking fourteen arrows in his hand and cut Ashwatthama's bow. Along with that he also broke his flag, umbrella, banner, sword, spear and mace into pieces. Thereafter he inflicted a deep wound on Ashwatthama's collarbone with arrows called 'Vatsadant'.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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