श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 46: कौरव-सेनाकी व्यूह-रचना, युधिष्ठिरके आदेशसे अर्जुनका आक्रमण, शल्यके द्वारा पाण्डव-सेनाके प्रमुख वीरोंका वर्णन तथा अर्जुनकी प्रशंसा  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  8.46.86 
असाविन्द्र इवासह्य: सात्यकि: सात्वतां वर:।
युयुत्सुरुपयात्यस्मान् क्रुद्धान्तकसम: पुर:॥ ८६॥
 
 
अनुवाद
हमारे सामने सात्वतवंश के श्रेष्ठ योद्धा सात्यकि हैं, जो अपने शत्रुओं के लिए इन्द्र के समान असह्य हैं, जो यमराज के समान क्रोध में भरे हुए युद्ध की इच्छा से सामने से हमारी ओर आ रहे हैं ॥86॥
 
In front of us is Satyaki, the best warrior of the Satvatavansh, who is as unbearable to his enemies as Indra, who is coming towards us from the front like Yamraj, filled with anger, with the desire for war. 86॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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