श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 46: कौरव-सेनाकी व्यूह-रचना, युधिष्ठिरके आदेशसे अर्जुनका आक्रमण, शल्यके द्वारा पाण्डव-सेनाके प्रमुख वीरोंका वर्णन तथा अर्जुनकी प्रशंसा  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  8.46.81 
अमर्षी नित्यसंरब्धश्चिरं वैरमनुस्मरन्।
एष भीमो जयप्रेप्सुर्युधि तिष्ठति वीर्यवान्॥ ८१॥
 
 
अनुवाद
सदैव क्रोध में भरे हुए और बहुत समय से चली आ रही शत्रुता को स्मरण करते हुए वीर एवं पराक्रमी भीमसेन विजय की इच्छा से युद्ध के लिए खड़े हैं ॥ 81॥
 
Always filled with anger and remembering the enmity for a long time, the valiant and valiant Bhimasena is standing for the battle with the desire of victory. ॥ 81॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas