श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 46: कौरव-सेनाकी व्यूह-रचना, युधिष्ठिरके आदेशसे अर्जुनका आक्रमण, शल्यके द्वारा पाण्डव-सेनाके प्रमुख वीरोंका वर्णन तथा अर्जुनकी प्रशंसा  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  8.46.64 
निरस्तनेत्रजिह्वान्त्रा वाजिन: सह सादिभि:।
पतिता: पात्यमानाश्च क्षितौ क्षीणाश्च शेरते॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
जिनके नेत्र, जीभ और अंतड़ियाँ बाहर निकल आई हैं, वे गिरकर नीचे गिराए जा रहे हैं, तथा सवारों सहित घोड़े भी क्षत-विक्षत होकर भूमि पर पड़े हैं॥ 64॥
 
Those whose eyes, tongues and intestines have come out, have fallen and are being thrown down, and the horses along with their riders are lying on the ground, mutilated.॥ 64॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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