श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 44: कर्णके द्वारा मद्र आदि बाहीक देशवासियोंकी निन्दा  »  श्लोक 17-18h
 
 
श्लोक  8.44.17-18h 
शतद्रुकामहं तीर्त्वा तां च रम्यामिरावतीम्॥ १७॥
गत्वा स्वदेशं द्रक्ष्यामि स्थूलशङ्खा: शुभा: स्त्रिय:।
 
 
अनुवाद
‘मैं कब सतलुज और सुन्दर रावी नदी को पार करके अपने देश में पहुँचूँगा और वहाँ शंख की मोटी-मोटी चूड़ियाँ पहने सुन्दर स्त्रियों को देखूँगा?॥17 1/2॥
 
‘When will I cross the Sutlej and the beautiful river Ravi and reach my country and see the beautiful women there wearing thick bangles made of conch shells?॥ 17 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)