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mahabharat 8.42.26-27h: मैं युद्धभूमि में इस धनंजय के साथ युद्ध करूँगा, चाहे मृत्यु हो या विजय। मेरे अतिरिक्त ऐसा कोई दूसरा पुरुष नहीं है जो इन्द्र के समान पराक्रमी तथा एक रथ से युद्ध करने में समर्थ पाण्डुपुत्र अर्जुन के साथ युद्ध कर सके। 26 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 8.42: कर्णका श्रीकृष्ण और अर्जुनके प्रभावको स्वीकार करते हुए अभिमानपूर्वक शल्यको फटकारना और उनसे अपनेको परशुरामजीद्वारा और ब्राह्मणद्वारा प्राप्त हुए शापोंकी कथा सुनाना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 42: कर्णका श्रीकृष्ण और अर्जुनके प्रभावको स्वीकार करते हुए अभिमानपूर्वक शल्यको फटकारना और उनसे अपनेको परशुरामजीद्वारा और ब्राह्मणद्वारा प्राप्त हुए शापोंकी कथा सुनाना  »  श्लोक 26-27h
 
 
श्लोक  8.42.26-27h 
योत्स्याम्येनं शल्य धनंजयं वै
मृत्युं पुरस्कृत्य रणे जयं वा॥ २६॥
अन्यो हि न ह्येकरथेन मर्त्यो
युध्येत य: पाण्डवमिन्द्रकल्पम्।
 
 
अनुवाद
मैं युद्धभूमि में इस धनंजय के साथ युद्ध करूँगा, चाहे मृत्यु हो या विजय। मेरे अतिरिक्त ऐसा कोई दूसरा पुरुष नहीं है जो इन्द्र के समान पराक्रमी तथा एक रथ से युद्ध करने में समर्थ पाण्डुपुत्र अर्जुन के साथ युद्ध कर सके। 26 1/2॥
 
Surge! I will fight with this Dhananjay on the battlefield, keeping death or victory in mind. Apart from me, there is no other person who can fight with Arjuna, the son of Pandu, who is as mighty as Indra and can fight with a single chariot. 26 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)