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श्लोक 8.39.35  |
यथानृतं च सत्यं च यथा चापि विषामृते।
तथा त्वमपि पार्थश्च प्रख्यातावात्मकर्मभि:॥ ३५॥ |
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| अनुवाद |
| जैसे सत्य और असत्य, विष और अमृत के भिन्न-भिन्न प्रभाव होते हैं, वैसे ही आप और अर्जुन भी अपने-अपने कर्मों के कारण सर्वत्र प्रसिद्ध हैं।॥35॥ |
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| Just as truth and lie, poison and nectar have different effects, similarly you and Arjuna are also famous everywhere for your respective deeds.'॥ 35॥ |
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इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्याधिक्षेपे एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ३९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्णके प्रति शल्यका आक्षेपविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३९॥
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