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श्लोक 8.39.28  |
शृगालोऽपि वने कर्ण शशै: परिवृतो वसन्।
मन्यते सिंहमात्मानं यावत् सिंहं न पश्यति॥ २८॥ |
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| अनुवाद |
| कर्ण! वन में खरगोशों के साथ रहने वाला सियार भी अपने को तब तक सिंह ही मानता है, जब तक वह सिंह को न देख ले॥ 28॥ |
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| Karna! Even a jackal living with rabbits in the forest believes itself to be a lion until it sees a lion.॥ 28॥ |
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