श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 39: शल्यका कर्णके प्रति अत्यन्त आक्षेपपूर्ण वचन कहना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  8.39.28 
शृगालोऽपि वने कर्ण शशै: परिवृतो वसन्।
मन्यते सिंहमात्मानं यावत् सिंहं न पश्यति॥ २८॥
 
 
अनुवाद
कर्ण! वन में खरगोशों के साथ रहने वाला सियार भी अपने को तब तक सिंह ही मानता है, जब तक वह सिंह को न देख ले॥ 28॥
 
Karna! Even a jackal living with rabbits in the forest believes itself to be a lion until it sees a lion.॥ 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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