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श्लोक 8.39.17  |
त्रिशूलमाश्रित्य सुतीक्ष्णधारं
सर्वाणि गात्राणि विघर्षसि त्वम्।
सुतीक्ष्णधारोपमकर्मणा त्वं
युयुत्ससे योऽर्जुनेनाद्य कर्ण॥ १७॥ |
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| अनुवाद |
| कर्ण! अर्जुन का पराक्रम अत्यन्त तीक्ष्ण धार वाले त्रिशूल के समान है। आज तुम उस अर्जुन के साथ जो युद्ध करना चाहते हो, वह अर्थात् उस तीक्ष्ण त्रिशूल को लेकर अपने शरीर के सब अंगों को रगड़ने या खरोंचने के समान है॥ 17॥ |
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| Karna! Arjuna's prowess is like a trident with a very sharp edge. The battle you want to fight with that Arjuna today is in other words like taking the sharp trident and rubbing or scratching all your body parts with it.॥ 17॥ |
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