एवं तस्मिन् महाराज कल्पिते रथसत्तमे।
देवैर्मनुजशार्दूल द्विषतामभिमर्दने॥ ४१॥
स्वान्यायुधानि मुख्यानि न्यदधाच्छङ्करो रथे।
ध्वजयष्टिं वियत् कृत्वा स्थापयामास गोवृषम्॥ ४२॥
अनुवाद
पुरुषसिंह! महाराज! जब देवताओं ने इस प्रकार शत्रुओं का संहार करने में समर्थ उस उत्तम रथ का निर्माण कर लिया, तब भगवान शंकर ने उस पर अपने प्रमुख अस्त्र-शस्त्र रखे, ध्वजदण्ड को आकाश-व्यापी बनाया और अपने नन्दी नामक बैल को उस पर स्थापित किया ॥ 41-42॥
Purushsingh! Maharaj! After the gods had thus constructed that excellent chariot, capable of killing enemies, Lord Shankar placed his main weapons on it, made the flagstaff sky-wide and placed his bull Nandi on it. ॥ 41-42॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥