श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 33: दुर्योधनका शल्यसे त्रिपुरोंकी उत्पत्तिका वर्णन, त्रिपुरोंसे भयभीत इन्द्र आदि देवताओंका ब्रह्माजीके साथ भगवान् शंकरके पास जाकर उनकी स्तुति करना  »  श्लोक d5
 
 
श्लोक  8.33.d5 
(नि:स्थानाश्च कृता देवा ऋषय: पितृभि: सह।
दैत्यैस्त्रिभिस्त्रयो लोका ह्याक्रान्तास्तै: सुरेतरै:॥ )
 
 
अनुवाद
देवताओं के शत्रु उन तीनों दैत्यों ने देवताओं, पितरों और ऋषियों को भी उनके स्थानों से हटाकर असहाय कर दिया था। केवल वे ही नहीं, अपितु तीनों लोकों के निवासी भी उनके द्वारा रौंदे जा रहे थे।
 
Those three demons who were enemies of the gods also displaced the gods, ancestors and sages from their places and rendered them helpless. Not only them, the inhabitants of the three worlds were being trampled by them.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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