श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 33: दुर्योधनका शल्यसे त्रिपुरोंकी उत्पत्तिका वर्णन, त्रिपुरोंसे भयभीत इन्द्र आदि देवताओंका ब्रह्माजीके साथ भगवान् शंकरके पास जाकर उनकी स्तुति करना  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  8.33.57 
विलोहिताय रुद्राय नीलग्रीवाय शूलिने।
अमोघाय मृगाक्षाय प्रवरायुधयोधिने॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
आप लाल रंग वाले हैं, पापियों को रुलाने वाले रुद्र हैं, नीले कंठ वाले हैं और त्रिशूल धारण करते हैं, आपके दर्शन मात्र से अमोघ फल मिलता है, आपके नेत्र मृग के समान हैं और आप श्रेष्ठ शस्त्रों से युद्ध करते हैं। आपको नमस्कार है॥ 57॥
 
‘You are of red complexion, you are Rudra who makes sinners cry, you have blue throat and hold a trident, your mere sight gives infallible results, your eyes are like those of a deer and you fight with the best weapons. Salutations to you.॥ 57॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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