श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 33: दुर्योधनका शल्यसे त्रिपुरोंकी उत्पत्तिका वर्णन, त्रिपुरोंसे भयभीत इन्द्र आदि देवताओंका ब्रह्माजीके साथ भगवान् शंकरके पास जाकर उनकी स्तुति करना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  8.33.43 
अहं हि तुल्य: सर्वेषां भूतानां नात्र संशय:।
अधार्मिकास्तु हन्तव्या इति मे व्रतमाहितम्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
इसमें कोई संदेह नहीं कि मैं सब प्राणियों के प्रति समान भाव रखता हूँ, फिर भी मैंने पापात्माओं को मारने का व्रत लिया है ॥ 43॥
 
There is no doubt that I have equal feelings for all creatures, yet I have taken a vow to kill the sinful souls. ॥ 43॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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