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mahabharat 8.32.21: पहले के युद्धों में अर्जुन ने इस प्रकार शत्रुओं का संहार नहीं किया था। इस बार श्रीकृष्ण के साथ होने से उसका पराक्रम बढ़ गया है॥ 21॥   |   mahabharat अध्याय 8.32: दुर्योधनकी शल्यसे कर्णका सारथि बननेके लिये प्रार्थना और शल्यका इस विषयमें घोर विरोध करना, पुन: श्रीकृष्णके समान अपनी प्रशंसा सुनकर उसे स्वीकार कर लेना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 32: दुर्योधनकी शल्यसे कर्णका सारथि बननेके लिये प्रार्थना और शल्यका इस विषयमें घोर विरोध करना, पुन: श्रीकृष्णके समान अपनी प्रशंसा सुनकर उसे स्वीकार कर लेना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  8.32.21 
पूर्वं न समरे ह्येवमवधीदर्जुनो रिपून्।
इदानीं विक्रमो ह्यस्य कृष्णेन सहितस्य च॥ २१॥
 
 
अनुवाद
पहले के युद्धों में अर्जुन ने इस प्रकार शत्रुओं का संहार नहीं किया था। इस बार श्रीकृष्ण के साथ होने से उसका पराक्रम बढ़ गया है॥ 21॥
 
In earlier wars, Arjuna did not kill his enemies in this manner. This time, because Shri Krishna is with him, his prowess has increased.॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)