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mahabharat 8.31.40: सव्यसाची अर्जुन हाथी आदि के विशाल शरीरों को छेदने में, शीघ्रतापूर्वक शस्त्र चलाने में, दूर के लक्ष्यों को भेदने में, सुन्दरता से युद्ध करने में तथा दिव्यास्त्रों के प्रयोग में मेरे समान नहीं है ॥40॥   |   mahabharat अध्याय 8.31: रात्रिमें कौरवोंकी मन्त्रणा, धृतराष्ट्रके द्वारा दैवकी प्रबलताका प्रतिपादन, संजयद्वारा धृतराष्ट्रपर दोषारोप तथा कर्ण और दुर्योधनकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 31: रात्रिमें कौरवोंकी मन्त्रणा, धृतराष्ट्रके द्वारा दैवकी प्रबलताका प्रतिपादन, संजयद्वारा धृतराष्ट्रपर दोषारोप तथा कर्ण और दुर्योधनकी बातचीत  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  8.31.40 
कायस्य महतो भेदे लाघवे दूरपातने।
सौष्ठवे चास्त्रपाते च सव्यसाची न मत्सम:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
सव्यसाची अर्जुन हाथी आदि के विशाल शरीरों को छेदने में, शीघ्रतापूर्वक शस्त्र चलाने में, दूर के लक्ष्यों को भेदने में, सुन्दरता से युद्ध करने में तथा दिव्यास्त्रों के प्रयोग में मेरे समान नहीं है ॥40॥
 
Savyasachi Arjun is not equal to me in piercing the huge bodies of elephants etc., in wielding weapons quickly, in hitting distant targets, in fighting beautifully and in the use of divine weapons. 40॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)